को इंडस्ट्री की सेल्फ मेड अभिनेत्री कहा जाता है। गैर फिल्मी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली कियारा की पहली फिल्म 'फगली' बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, मगर अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के बलबूते पर उन्होंने सफलता नई इबारत लिखी। 'गुड न्यूज', 'गिल्टी', 'लस्ट स्टोरीज', 'इंदु की जवानी' और 'शेरशाह' जैसी फिल्मों में महिलाओं के विविधरंगी किरदारके बाद वह आने वाले समय में वह 'भूल भुलैया 2', विकी कौशल के साथ की फिल्म, 'जुग जुग जियो' और 'आरसी-15' में नजर आएंगी।इन ख़ास मुलाकात में वह दिवाली, करियर, सफलता, संघर्ष और परिवार पर बात करती हैं। इस दिवाली पर क्या खास कर रही हैं? दिवाली मेरे लिए पारिवारिक ओकेजन है। कोशिश करती हूं कि अपने परिवार के साथ वक्त बिताऊं। दिवाली पर शायद मैं जुगजुग जियो की शूटिंग कर रही हूं, तो शायद सेट पर रहूंगी। कोशिश करूंगी कि शूटिंग के सेट से वक्त निकाल कर कुछ घंटे दिवाली पूजा के लिए घर आ सकूं। परिवार के साथ वक्त बिता सकूं। वैसे फिल्म के सेट पर भी परिवार जैसा माहौल होता है, तो वहां भी दिवाली मनाई जाती है। हो सकता है मेरा दिवाली धमाल जुग जुग जियो के सेट पर हो। आज जब आप मुड़ कर देखती हैं, तो आपको अपना फिल्मी सफर कैसा लगता है?सबसे पहले तो मैं शुक्रगुजार हूं कि मुझे बॉलिवुड में न केवल मौका मिला बल्कि इतने विविधरंगी रोल करने के अवसर भी प्राप्त हुए। मेरा अभिनय का सफर कई उतार-चढ़ावों से गुजरा। कई नाकामियां और रिजेक्शन मैंने सही, मगर मैं उन्हें अपनी यात्रा की सीख मानती हूं। उन्हीं कड़वे अनुभवों से मैं मजबूत बनी, अपना रास्ता अख्तियार कर पाई और अपनी चॉइसेज पर अडिग रही। मैं मानती हूं कि मेरे द्वारा लिए गए सभी फैसले सही साबित नहीं हुए, मगर वो मेरे लिए एक सीखने की प्रक्रिया जरूर साबित हुई। आज मैं अपने करियर के जिस मुकाम पर हूं, वो बहुत दिलचस्प है, क्योंकि मैं अभिनेत्री के रूप में निखरी हूं, संवरी हूं और अब भी मेरी खोज निरंतर जारी है। क्या ये सच है कि अभिनय के क्षेत्र में आने से पहले आपने शिक्षिका के रूप में भी काम किया है?आप उसे एक पूर्णतया टीचिंग का काम तो नहीं कह सकते, मगर हां अपनी पहली फिल्म में काम करने से पहले मैं 6-8 महीनों के लिए नन्हे-नन्हे बच्चों की टीचर जरूर बनी थी। असल में उन दिनों मैं अभिनय के क्षेत्र में प्रयास रत थी और एक्टिंग क्लासेज के अलावा दुसरे वर्कशॉप्स भी ले रही थी, तो मेरे पास थोड़ा-सा समय था। मेरी मम्मी एक छोटा-सा स्कूल चलाया करती थीं। उसी स्कूल में मैंने कुछ महीनों तक छोटे बच्चों को पढ़ाया है। बच्चों को पढ़ाने में काफी मजा आता था। मैं उस दौरान अपनी मम्मी की मदद करना चाहती थी, जो मैंने की, मगर फिर जल्द ही मुझे अपनी पहली फिल्म मिल गई और मैं अभिनय की राह पर चल पड़ी। आप टीनेज में कैसी लड़की थीं?मुझे लगता है लकड़ियों को जब मम्मी हमें इजाज़त देती है कि ठीक है अब आप काजल लगा सकते हैं और मेक-अप कर सकते हैं। क्योंकि मैं पहले छुपछुप कर मम्मी का मेक-अप लगाती थी, लड़कियों को बड़ा शौक होता है मेकअप का। मैं 9 वी कक्षा में थी, जब उन्होंने मुझे मंजूरी दी। वह मेरे साथ बहुत सख्त थीं। मैं पार्टी में भी जाती थी तो कहती थी कि इतने समय तुमको वापस आना है। वह अब भी मुझे फोन करके पूछती है, कहां हो कब तक घर आओगी? फगली से लेकर शेरशाह तक का सफर कैसा रहा?बेहद रिवार्डिंग। फगली में मेरी भूमिका दिलचस्प थी और उसके बाद कबीर सिंह हो या गुड न्यूज अथवा शेरशाह अलग-अलग तरह के रोल्स मिले और वो भी बड़े कलाकारों के साथ, तो बहुत दिलचस्प रहा ये सफर। मैंने अपनी हर फिल्म से निजी तौर पर ही नहीं बल्कि व्यावसायिक रूप से कुछ न कुछ सीखा है। अभिनेत्री के रूप में ही नहीं बल्कि व्यक्ति के रूप में भी मैं परिपक्व हुई हूं। आपके करियर की शुरुआत 'फगली' से छोटे स्तर पर हुई, मगर आगे चलकर आप हीरोज के मामले में लकी साबित हुई हैं। वरुण हो, शाहिद हो, दिलजीत हो अथवा अक्षय या फिर सिद्धार्थ मल्होत्रा, कैसा रहा इनका साथ?सच कहूं तो मैं खुद को बहुत खुशनसीब मानती हूं कि मुझे ऐसे मौके मिल रहे हैं, ऐसे लोगों के साथ काम करने का अवसर मिल रहा है। बहुत कुछ सीखने मिल रहा है। जैसे शाहिद से 'कबीर सिंह' में बहुत कुछ सीखने को मिला। अभिनय साझेदारी का काम होता है। आप अकेले नहीं होते सीन में, सह अभिनेता होते हैं, आपका नायक होता है। ऐसे में किसी एक का भी प्रदर्शन ऊपर-नीचे या आगे-पीछे हो जाए, तो पूरे सीन का मजा चला जाता है। सबका एक ही स्तर पर होना बहुत जरूरी हो जाता है। हीरो-हीरोइन दोनों सीन को एक साथ संभालते हैं। शाहिद के साथ तो बहुत मजा आया। 'गुड न्यूज' के सेट पर जब अक्षय और दिलजीत साथ होते थे, तो इतना हंसी- मजाक होता था कि हम हंसते- हंसते आखिर में रो देते थे। शेरशाह में सिद्धार्थ मल्होत्रा एक बहुत अच्छे साथी कलाकार साबित हुए। बहुत कुछ सीखा अपने साथी कलाकारों से, फिर चाहे कॉमिडी की बात हो या टाइमिंग की, यहां से मैं ये सब आगे ही ले जाऊंगी। इंडस्ट्री में आपने अपना मुकाम बिना किसी गॉडफादर के बनाया?कोई भी गॉडफादर आपको सफलता की गैरंटी नहीं दे सकता। अपना रास्ता आपको खुद बनाना पड़ता है। मैं तो भगवान को अपना गॉडफादर मानती हूं। मैं इस बात पर बहुत ही गहराई और गंभीरता से यकीन करती हूं कि आप जो भी हो अपने टैलंट और स्किल के कारण हो। आप अपनी प्रतिभा के बलबूते पर यहां अपनी जगह बना पाते हैं। आपको लगातार मेहनत करते रहना पड़ता। है आज आप इंडस्ट्री में अपना मुकाम बना चुकी हैं, मगर क्या कभी आपको रिजेक्शन का सामना करना पड़ा है?रिजेक्शन और नकारे जाना जीवन का हिस्सा है। हर कलाकार को अपने करियर में कभी न कभी रिजेक्शन का सामना जरूर करना पड़ता है। 'फगली' के बाद कई बार मैं रिजेक्ट की गई थी। मेरा मानना है कि हर इंसान को चीजों के प्रति एक सही नजरिया रखना चाहिए। अगर आपको कोई किसी फिल्म के लिए रिजेक्ट कर रहा है, तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपका करियर खत्म हो गया है। रिजेक्शन के प्रति सकारात्मक रवैया रखते हुए आगे बढ़ जाना चाहिए। इसे बहुत निजी तौर पर नहीं लेना चाहिए। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपकी जिंदगी खत्म हो गई है। यह एक सफर है, जिसमें अच्छे दिन होंगे, तो बुरे दिन भी होंगे। मेरे साथ जो रिजेक्शन हो रहा था, वह बस एक दौर था, जब मुझे फिल्में नहीं मिल रही थीं और रोल्स किसी और को मिलते जा रहे थे। जिस तरह के रोल्स मैं करना चाहती थी, उस तरह के भी मिल नहीं रहे थे। निर्माताओं से मिलती थी, तो भी चूंकि पिछली फिल्म 'फगली' अच्छी नहीं थी, तो कास्ट नहीं हो रही थी। लोग कई बार बॉक्स ऑफिस की सफलता देखते हैं। फ्लॉप फिल्म के बाद काम नहीं मिलता। मैं फिर भी ऑडिशन देती रही। इसी दौरान जब धोनी की बायॉपिक मिली और चीजें बदल गईं और आज मैं यहां हूं।
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